'जन नायकन' रिव्यू: विजय का दमदार स्क्रीन प्रेजेंस, लेकिन कहानी पर भारी पड़ी राजनीतिक प्रस्तुति
Jan Nayakan, Vijay

विजय की आखिरी फिल्म 'जन नायकन' को लेकर दर्शकों में भारी उत्साह था, लेकिन फिल्म उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती। निर्देशक एच. विनोथ ने इसे एक प्रभावशाली विदाई बनाने के बजाय राजनीतिक संदेशों और विजय की स्टार छवि को उभारने पर अधिक जोर दिया है। करीब 3 घंटे 3 मिनट लंबी यह फिल्म कई जगह मनोरंजक कहानी से भटककर भाषण जैसी महसूस होती है। विजय अपने दमदार अभिनय और स्क्रीन प्रेजेंस से दर्शकों को बांधे रखते हैं, लेकिन कमजोर पटकथा और जरूरत से ज्यादा लंबी अवधि फिल्म की रफ्तार को प्रभावित करती है।

 

फिल्म की कहानी वेत्री (विजय) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक जेलर की बेटी के सपनों को पूरा करने की जिम्मेदारी उठाता है। इसी बीच अंतरराष्ट्रीय अपराधी जॉन हिमलर (बॉबी देओल), पत्रकार कयाल (पूजा हेगड़े) और कई सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे कहानी का हिस्सा बनते हैं। शुरुआत भावनात्मक होने के बावजूद फिल्म बाद में महिला सशक्तिकरण, आतंकवाद, भ्रष्टाचार और सत्ता की राजनीति जैसे कई विषयों में उलझ जाती है, जिससे मूल कहानी कमजोर पड़ जाती है। कुल मिलाकर, विजय के प्रशंसकों के लिए यह फिल्म भावनात्मक अनुभव हो सकती है, लेकिन एक मजबूत सिनेमाई विदाई बनने से चूक जाती है।

Priyanshi Chaturvedi 23 July 2026

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