यूपी की राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी: 75 साल का अधूरा सफर
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी 75 साल बाद भी सीमित ही दिखती है। वोटिंग में महिलाएं लगातार पुरुषों से आगे रही हैं, लेकिन सत्ता के शीर्ष पदों तक उनकी पहुंच बेहद कम रही है। लोकसभा और विधानसभा में उनकी हिस्सेदारी कभी 10-12 फीसदी से ऊपर नहीं जा पाई, जबकि वोटर लिस्ट में उनकी मौजूदगी लगभग आधी है। कई सीटें आज भी ऐसी हैं जहां कभी कोई महिला प्रतिनिधि नहीं चुनी गई।

1952 से लेकर 2022 तक के चुनावों में यह तस्वीर बार-बार दोहराई गई है। शुरुआती दौर में कुछ सफलता के बाद लंबे समय तक महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी स्थिर रही। मंत्रिमंडलों में भी उनकी संख्या बेहद कम रही—अधिकतर सरकारों में यह हिस्सेदारी 1 से 7 फीसदी के बीच ही रही। हालांकि पंचायत स्तर पर आरक्षण के बाद स्थिति थोड़ी बदली, लेकिन वहां भी असली सत्ता अक्सर प्रतीकात्मक रूप में ही दिखाई देती है।

राजनीतिक दलों की टिकट नीति और परिवारवाद भी इस असंतुलन की बड़ी वजह रहा है। कई बार महिलाएं केवल राजनीतिक परिवारों से आने के कारण ही प्रतिनिधित्व हासिल कर पाती हैं। स्वतंत्र रूप से राजनीति में आने वाली महिलाओं की संख्या बेहद कम है, जिससे सत्ता में उनकी असली भागीदारी सीमित रह जाती है।

महिला आरक्षण विधेयक अगर पास होता, तो संसद और विधानसभाओं में उनकी मौजूदगी बढ़ सकती थी, लेकिन सिर्फ संख्या बढ़ने से वास्तविक ताकत सुनिश्चित नहीं होती। पंचायतों का अनुभव बताता है कि जब तक प्रशिक्षण, स्वतंत्र नेतृत्व और सामाजिक सोच में बदलाव नहीं आएगा, तब तक महिलाओं की राजनीतिक शक्ति अधूरी ही रहेगी।

Priyanshi Chaturvedi 19 April 2026

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