मप्र में पावरलूम 5 हजार पार, लेकिन हथकरघा बुनकर अब भी सहारे के मोहताज
7 अगस्त राष्ट्रीय हथकरघा दिवस है, जो चंदेरी, महेश्वर और बुरहानपुर जैसे क्षेत्रों की सदियों पुरानी बुनकरी परंपरा को सम्मान देने का अवसर है। लेकिन मध्यप्रदेश में हथकरघा और पावरलूम के बीच बढ़ता अंतर चिंता का विषय है। एमएसएमई विभाग के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में पावरलूम की संख्या 2025-26 में बढ़कर 5,047 हो गई, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे ज्यादा है। 2021-22 में 4,649 पावरलूम थे, जो लगातार बढ़ते हुए अब 5 हजार के पार पहुंच गए हैं। इसके उलट चंदेरी में करीब 13 हजार, महेश्वर में 3,540, ग्वालियर में 160, बारा सिवनी में 120 और निवाड़ी में 40 हथकरघा बुनकर अपनी पारंपरिक कला को आगे बढ़ा रहे हैं।
पावरलूम से बड़े पैमाने पर उत्पादन और बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, लेकिन हथकरघा की पहचान उसकी हस्तनिर्मित गुणवत्ता और सांस्कृतिक विरासत से है। ऐसे में जरूरत है कि हथकरघा बुनकरों को भी तकनीक, वित्त, ब्रांडिंग, मार्केटिंग और ई-कॉमर्स का मजबूत प्लेटफॉर्म मिले। ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘मेक इन इंडिया’ का लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब पारंपरिक कारीगरों को आधुनिक बाजार से जोड़ा जाए। प्रदेश में हथकरघा उत्पादों की सरकारी खरीद को बढ़ावा देने और सभी विभागों में इन वस्त्रों के इस्तेमाल को अनिवार्य करने जैसी पहल बुनकरों के लिए बड़ा सहारा बन सकती है।